कूड़े के ढेर में कोहिनूर


रोज रात को सोने से पहले और सुबह उठने के बाद दिमाग में सिर्फ एक ही ख़याल रहता था कि पेट कैसे भरूँगा। कैसे दाल,रोटी खाऊंगा? क्या कोई भीख में पैसे देगा भी? किस मंदिर, मस्जिद में जाऊँगा ? तरह -तरह के हजारों खयालात दिमाग में चलते रहते थे, और फिर थोड़ी देर बाद आँख खुल जाती थी।
चल उठ! पता नहीं कहाँ- कहाँ से चले आते हैं। इतनी आवादी बढ़ चुकी है सरकार भी इस ओर ध्यान नहीं देती। पता नहीं सब के सब सुबह -सुबह मेरी ही दुकान के सामने क्यों मरने चले आते हैं.. इतना बोलते हुए दुकान वाला गालियां देकर भगा देता है। अब न ही नींद पूरी हो पायी और न ही कुछ खाने का इंतजाम हुआ।  अब भला कहाँ जाऊँ ? सब गालियां देकर भगा देते है कोई भी ऐसा नहीं होता जो एक निवाला ही दे दे खाने को। जब कहीं कुछ भी इंतजाम नहीं होता था तो कूड़े के ढेर से ही कुछ निकाल के खा लेता था।
लावारिस था, अनाथ था, न ही रहने को घर था और न पहनने को कपड़े, ज़िन्दगी में कोई दुःख बचा ही नहीं था। लेकिन फिर भी ऊपर वाला ये सब देकर खुश नहीं था। एक दिन रास्ते में जा रहा था एक अमीरजादे ने रफ़्तार से आ रही अपनी कार से मुझे उड़ा दिया, गनीमत मानो कि उस दिन मैं मरने से बच गया बस केबल सर ही फूटा था। जब होश आया तो पता चला की सरकारी अस्पताल के एक बेड पर लेता था और शरीर के अधिकतर हिस्से से खून बह रहा था। कोई देखने वाला भी नहीं था क्यूंकि मैं गरीब था। फिर थोड़ी देर बाद एक अच्छी सी पोशाक पहने एक लड़का मेरे पास आया और बोला कि मुझसे गलती से ऐसा हुआ, तुम जो चाहो मुझे सजा दे सकते हो। इतना कहने के बाद उसने डॉक्टर को आवाज लगाईं और फिर मेरी पट्टी हुई।
कुछ देर बाद सब सही हो जाने के पर उसने मुझसे पूछा कि तुम कहाँ रहते हो ? क्या करते हो ?
मेरे पास कोई जबाब नहीं था। मैंने सर झुका लिया। लेकिन उसने फिर से पूछा..........
मेरे मुँह से सारी बात सुन लेने के बाद फिर अंत में उसने मुझसे कहा कि नौकरी करोगे, तनख्वाह तो मिलेगी ही साथ में रहना खाना भी होगा और महीने में 4 छुट्टियां भी मिलेंगी।
मेरे लिए वो व्यक्ति किसी भगवान से कम नहीं था।  मैं अंदर ही अंदर ख़ुशी से झूम रहा था, मैं अपनी सारी पीड़ा भूल चुका था। बस आँख से आँशू बहाये जा रहा था और इंतजार कर रहा था कि .................
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