भारत के दूसरे सबसे अमीर आदमी दिलीप सांघवी की कहानी

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 मैंने खुद को कभी भी एक संस्थापक के रूप में नहीं देखा ,मैं स्वमं का मूल्यांकन हमेशा एक मेनेजर के रूप में करता हूँ |
 
1 अक्टूबर 1955 को गुजरात के एक छोटे से परिवार में जन्मा वह व्यक्ति जिसने महज पूरे भारतवर्ष के साथ ही साथ दुनिया के कई देशों में अपनी लीडरशिप से व्यापार का वो तिलिस्मी पहाड़ खड़ा किया जिसकी बदौलत बर्ष 2015 में भारत का सबसे धनाड्य व्यक्ति कहलाया। और अंतता जिसे बर्ष 2016 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री के पुरूस्कार से नवाजा गया.



“डर मुझे भी लगा फांसला देख कर, पर मैं बढ़ता गया रास्ता देख कर, खुद ब खुद मेरे नज़दीक आती गई मेरी मंज़िल मेरा हौंसला देख कर।”

गुजरात के अमरेली में जन्मे दिलीप सांघवी ने अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई यूनिवर्सिटी ऑफ़ कलकत्ता से की।  दिलीप सांघवी के पिता कोलकाता मे जेनरिक दवाओं के होल्सेल डिस्ट्रीव्यूटर थे। पढ़ाई पूरी करने के साथ से ही दिलीप ने पिता के काम में उनका हाथ बटाना शुरू किया। काफी समय तक पिता के साथ काम करने के बाद उन्होने कुछ बडा करने की ठानी और बर्ष 1982 मे अपने पिता दस हजार रुपये उधार लेकर मुम्बई आ गये. और फिर यही से शुरु हुई उनकी जिंदगी की असली कहानी. और फिर मुम्बई पहुचकर उन्होने मात्र दो लोगो की मार्केटिंग टीम के साथ पांच मनोचिकित्सक दवाइयों की सन फार्मा के साथ शुरुआत की. और महज कुछ ही महीनों में उन्होंने 70 लाख रुपये का कारोवार किया और फिर बाद में उन्होंने कुछ और पैसे उधार लेकर गुजरात के वापी में 5 लोगो की मदद से अपनी पहली सन फर्मास्यूटिकल नाम से मनुफैक्चरिंग इकाई स्ठापित की. शुरुआति दिनो मे उनकी दवाओ की सप्लाई कुछ ही शहरो तक ही सीमित थी लेकिन बाद मे उन्होने अपनी टीम के साथ 4 साल मे कड़ी मेहनत और लगन के साथ पूरे भारतवर्ष मे दवाओ की सप्लाई की. दिलीप सांघवी ने इस इंडस्ट्री मे पहले से घाटे मे चल रही कई कम्पनियों को खरीद लिया और अपनी बेस्ट लीडरशिप के कारण उनसे बाद में अच्छा - खाशा मुनाफा कमाया. दिलीप सांघवी बिना पेटेंट वाली जेनेरिक दवाओं में अपना पोर्ट्फोलियो बड़ाते जा रहे थे .
ये ऐसे प्रोडक्ट्स थे जो उनके प्रतिद्वंदियों की प्राथिमिकता में नहीं आते थे. उन्होने ब्रेंड्स, प्राइसिंग स्ट्रेट्जी, सेल्स और डिस्ट्रीव्यूशन पर ज्यादा ध्यान दिया. जिसकी बदौलत उनकी दिनों दिन बढती चली गयी. बर्ष 1979 में उन्होने पढोसी देशों मे दवाओ का डिस्ट्रीव्यूशन करना शुरू कर दिया जो उनके लिये मील के पत्थर की तरह साबित हुआ. बर्ष 1991 में उन्होने अपनी कम्पनी के लिये एक रिसर्च सेंटर की स्ठापना की. और 1994 मे उन्होने अपनी कम्पनी का पब्लिक इस्यू निकाला, उन्होने अंत तक यह तय कर लिया था कि कम्पनी मे रिस्क बहुत मायने रखता है और फिर उन्होने कहा कि रिस्क् इतना कैल्क्यूलेटिड होना चाहिये कि इससे कम्पनी को ज्यादा नुक्सान ना होने पाये. दिलीप सांघवी की सफलता में घाटे में चल रही कम्पनियों के अधिग्रहण का अधिक योगदान रहा है, उन्होने तकरीवन 19 से ज्यादा कम्पनियों का अधिग्रहण किया. उनमे से अधिकतम कम्पनियां घाटे मे चल रहीं थीं. उन्होने कम्पनियों का नवीनीकरण कर घाटे को मुनाफे मे तब्दील कर दिया. आज उनकी आय का एक बहुत बडा हिस्सा उन्हीं कम्पनियों से आता है. ये दिलीप सांघवी की लीडरशिप का ही कमाल है जो सन फार्मा देश की सबसे बड़ी दवा कम्पनी बनकर उभरी है. बर्ष 2014 में 25,237 करोड़ मे रेनबैक्शी को अधिग्रहन ने उन्हे इंडिया के फार्मा सेक्टर का बाद्शाह बना दिया. आज उनका सेल्स नेट्वर्क 24 से ज्यादा देशों में फैला है. आज उनकी कम्पनी जेनेरिक दवायें बनाने वाली भारत की नम्बर 1 और विश्व की नम्बर 5 कम्पनी बन गयी है.कम्पनी की बधत का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते है कि जिसने बर्ष 1994 में कम्पनी मे 10,000 रुपये के शेयर खरीदे हो आज उनकी कीमत 50 लाख रुपये है और इसमे डिविडेंट शामिल नहीं है. तो आपने देखा कि कैसे एक मध्यम वर्गीय परिवार के बेटे ने इतनी कम पूंजी के साथ लाखों करोड़ों  रुपयों का कारोवार किया. फ़ोर्ब्स के मुताबिक़ दिलीप सांघवी की कुल संपत्ति 11.6 बिलियन USD है।
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